ए ईश्क़ , मुझपे येह थोडा एहसान कर,
रंग दे मुझे, थोडा बदनाम कर,
बडे सकून से गुज़र रही हैं ज़िन्दगी,
बेचैनी का थोड़ा, इंतज़ाम कर....
तेरे बीना ऐ इश्क, बेरंग हैं लगते मौसम सारे
बड़े रूखे रूखे से हैं मिजाज़ हमारे
या तो बदल दे नज़ारे , या नजरिया,
आ हमारी बेरुखी से ज़रा, जानपहचान कर
मैं रंजीश में हूँ, इस तलम ज़िन्दगी से
थोड़ा बेहेका दे मुझे, थोड़ा बेकाबू कर
मुझसे हो जाए, कोइ हसीं गुनाह
लालच का कोइ , ऐसा काम कर !
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