Wednesday, September 28, 2011


There are times when i feel incomplete inside. Times when I feel, wading through all the logic and trying to make sense of it all has become an addiction that reins in my natural instincts.

I am sure, my friends, that at one point in time or other all of you must have felt the same way. And felt an emptiness that is brimming to overflow.

Come then, let us loose ourselves in the most divine emotion God gifted us, let us ask it to embrace us.

ए ईश्क़ , मुझपे येह थोडा एहसान कर,
रंग दे मुझे, थोडा बदनाम कर,
बडे सकून से गुज़र रही हैं ज़िन्दगी,
बेचैनी का कोइ ,अब तो इंतज़ाम कर....

तेरे बीना ऐ इश्क, बेरंग हैं लगते मौसम सारे
बड़े रूखे रूखे से हैं मिजाज़ हमारे
या तो बदल दे नजरिया , या नज़ारे
आ इस बेरुखी से ज़रा, जानपहचान कर

मैं रंजीश में हूँ, इस तलम ज़िन्दगी से
थोड़ा बेहेका दे मुझे, थोड़ा बेकाबू कर
मुझसे हो जाए, कोइ हसीं गुनाह
लालच का कोइ , ऐसा काम कर !

Friday, September 16, 2011

ए ईश्क़ , मुझपे येह थोडा एहसान कर,
रंग दे मुझे, थोडा बदनाम कर,
बडे सकून से गुज़र रही हैं ज़िन्दगी,
बेचैनी का थोड़ा, इंतज़ाम कर....

तेरे बीना ऐ इश्क, बेरंग हैं लगते मौसम सारे
बड़े रूखे रूखे से हैं मिजाज़ हमारे
या तो बदल दे नज़ारे , या नजरिया,
आ हमारी बेरुखी से ज़रा, जानपहचान कर

मैं रंजीश में हूँ, इस तलम ज़िन्दगी से
थोड़ा बेहेका दे मुझे, थोड़ा बेकाबू कर
मुझसे हो जाए, कोइ हसीं गुनाह
लालच का कोइ , ऐसा काम कर !